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यदि रजनीकांत पेश करते भारत का बजट, तो बदल जाती भारत की तस्वीर!

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फर्ज कीजिए कि रजनीकांत को देश का यूनियन बजट पेश करना होता तो क्या होता! दरअसल हाल ही में मशहूर सिने स्टार रजनीकांत ने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर तमिलनाडु की राजनीति में हलचल पैदा कर दी थी. ऐसे में जाहिर है कि यदि भविष्य में रजनीकांत की पार्टी सत्ता में आती है तो उन्हें भी कम से कम तमिलनाडु की जनता के लिए बजट बनाते समय माथा-पच्ची तो करनी ही होगी.

रजनीकांत का बजट कैसा होगा! लोकलुभावन या फिर जनता की असली समस्याओं से निजात दिलवाने वाला ये तो समय तय करेगा, लेकिन हमने रजनी की स्क्रीन प्रेजेंस और फैंस के बीच उनकी लार्जर दैन लाइफ इमेज को देखते हुए आंकलन लगाया है कि शायद रजनी का बजट ऐसा होता…

रक्षा बजट में होती कटौती, शिक्षा—स्वास्थ्य पर फोकस

रजनीकांत के होते हुए भारतीय सीमाओं से भला कोई कैसे भीतर दाखिल हो सकता था. हर सीमा पर रजनी के रोबोट्स की फौज होती और ‘चिठ्ठी’ इसकी अगुवाई कर हर पल हेडक्वार्टर में संदेश भेज रहा होता— ‘हाय आई एम चिठ्ठी द रोबोट. स्पीड वन टेराहर्ट्ज, मेमोरी वन जीगाबाइट.. ऑल फाइन’. इसके बात भला भारी-भरकम रक्षा बजट की जरूरत ही नहीं रह जाती और इसके बदले इस बजट का उपयोग भारत के शिक्षा और स्वास्थ्य बजट को और अधिक मजबूत करने पर लगाया जाता. तब शायद पाकिस्तान से रोजमर्रा का झगड़ा भी नहीं होता और न अधिकांश भारतीय जान पाते डोकलाम भी कोई बला है!

रियल एस्टेट का पंगा यूं सुलझा लेते थलाईवा
अपना घर खरीदना हर कोई चाहता है और रजनी के बजट में ये सपना सबसे तेजी से शायद पूरा होता. रजनी के रहते न तो बिल्डर घर देने में आनाकानी करते और न लोग कर्ज के जंजाल में फंसते. रजनी के बजट का दस फीसदी हिस्सा शायद बेघरों को छत देने पर फोकस करता और इसमें पैसों की कमी आती तो थलाईवा रजनी ‘रिजर्व बैंक ऑफ रजनी’ को एक-एक करोड़ के नोट छापकर गरीबों में बांट आने का हुक्म सुना देते.

देश के भीतर न होती असहिष्णुता
रजनी की सरकार में देश के भीतर तनाव जरा कम रहता तो इससे राज्य की संपतियां भी उपद्रव में नुकसान होने से बच जाती. जहां दंगा होता वहां अकेले रजनी ही मोर्चा संभाले खड़े नजर आते और इससे पुलिस के भारी भरकम दस्तों में सरकार को ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता. तब रजनी अपने बजट में इस हिस्से पर खर्च होने वाली रकम को ‘शिशु मृृत्यु दर’ को रोकने और ‘बाल आहार’ की व्यवस्था सुनिश्चित करने पर फोकस करते.

नौकरी भी मिलती और इनकम टैक्स भी करता खुश
रजनी के बजट में सबसे जयादा ख्याल बेरोजगारों का रखा जाता. बेरोजगार सड़कों पर टहलने के बजाय या फिर ओला-ऊबर पर अपने मां-बाप की गाढ़ी कमाई खर्च करने के बजाय ‘रजनी आॅल गाइज राइज व्हीकल सर्विस’ का लाभ लेते. ये सर्विस मुफ्त में बेरोजगारों को पकड़-पकड कर देश की उन्नति के काम में लगाती. इससे सड़कों पर मनचले खत्म हो जाते और किसी एंटी रोमियो स्क्वॉड की शायद तब जरूरत ही नहीं पड़ती. रहा सवाल इनकम टैक्स का तो.. थलाइवा जो कहता है वह तो करता ही और जो नहीं कहता वह तो डेफिनेटली करता है.

चीन में बिकते मेक इन इंडिया के प्रोडक्ट, गारंटी मिलती लाइफटाइम
रजनी के बजट का एक बड़ा हिस्सा टेक्नॉलजी में खर्च होता. जगह-जगह मेक इन इंडिया के कारखाने नजर आते और चीन के बाजारों में शायद इसके खिलाफ प्रोटेस्ट देखने को मिलता. मजेदार बात यह होती कि इन प्रोडक्ट की गारंटी भी लाइफटाइम के लिए होती न कि चीन के यूज एंड थ्रो प्रोड्क्टस का झमेला होता. इससे अर्थव्यवस्था सुधरती तो हर महीने बजट पेश होता.

महिलाओं को ‘फेयर एंड लवली’ की नहीं पड़ती जरूरत
कॉस्मेटिक के महंगे होने की शिकायत की भी रजनी के बजट में कोई गुंजाइश नहीं होती. दाद, खाज, खुजली, दर्द, गोरा होने, मुहांसो सबके लिए एक ही ‘रजनी क्रीम’ से काम चल जाता. इससे कई सारे प्रोडक्ट को कैरी करने के झंझट से मुक्ति मिलने के साथ ही ‘लग्जरी टैक्स’ से भी निजात मिल जाती.

बजट से पहले और बाद दूध से नहाते रजनी
इतना मजेदार बजट पेश करने के बाद हम उम्मीद कर सकते हैं कि रजनी को बजट से पहले और बाद में दूध से नहलाया जाता. एक्सपर्ट कॉलेज में इकोनॉमिक्स पढ़ा रहे होते और टीवी स्टूडियों में बजट के नफे-नुकसान के शोर से इतर जीवन में संगीत भरने वाले तराने गूंज रहे होते.