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ओशो: दूसरों को जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ‘रजनीश’ की मौत आज भी है एक रहस्य

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अपने जीवन में भाषणों और प्रवचनों से विवाद में रहने वाले ओशो या आध्यात्मिक गुरु रजनीश की आज पुण्यतिथी है. 19 जनवरी 1990 को ओशो ने देह त्याग दिया था. लेकिन उनकी मौत भी विवादों से घिरी रही. जहां ओशो के कुछ शिष्यों का मानना है कि उनकी मौत प्राकृतिक नहीं थी, तो वहीं कुछ इस दावे को झूठा बताते हैं. ओशो की मौत आज भी संदेह के दायरे में सिमटी हुई है.

मौत पर विवाद क्यों?
19 जनवरी 1990 को पुणे के आश्रम में ओशो की मृत्यु हो गई थी. मौत के करीब 22 साल बाद ओशो के शिष्य और ओशो फ्रेंड्स फाउंडेशन के योगेश ठक्कर उर्फ प्रेमगीत ने ओशो की वसीयत में फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, साथ ही मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी. ठक्कर का आरोप था कि ओशो के इनटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स और उससे होने वाली कमाई का आए दिन ज्यूरिख, स्वीट्जरलैंड, अमेरिका और अन्य देशों में लेन-देन हो रहा है. उन्होंने इसके पीछे ओशो फाउंडेशन के छह ट्रस्टियों का नाम भी बताया.

इस याचिका के दायर किए जाने के कुछ दिनों बाद पुणे के डॉक्टर गोकाणी ने ओशो की मौत से जुड़ा एक और सनसनीखेज खुलासा किया था. डॉ. गोकाणी का कहना था कि वे ओशो की मृत्यु के समय पुणे के आश्रम के लाओत्से हाउस में मौजूद थे. ओशो की मौत से 5 घंटे पहले आश्रम में कई रहस्यमयी घटनाएं हुई थीं.

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डॉक्टर को बुलाया लेकिन ओशो से मिलने नहीं दिया
डॉ. गोकाणी का कहना था कि उनके आश्रम में मौजूद होने के बावजूद उन्हें ओशो को देखने नहीं दिया गया. उन्होंने बताया था कि ओशो की मृत्यु के दिन आश्रम के स्वामी जयेश के प्राइवेट सेक्रेटरी स्वामी चितन ने ही उन्हें फोन कर आश्रम बुलाया था. उन्हें कहा गया था कि ओशो देह त्याग रहे हैं, आप उन्हें बचा लीजिए. लेकिन जब डॉक्टर वहां पहुंचे तो उन्हें ओशो के पास नहीं जाने दिया गया. इसके बाद अचानक अंतिम समय में ओशो के साथ मौजूद डॉक्टर अमृतो आए और कहा कि ओशो मर रहे हैं.

डॉ. गोकाणी ने इन तर्कों के साथ कोर्ट में एफिडेविट भी पेश किया. डॉक्टर ने अपने हलफनामे में इस पूरे घटनाक्रम के बारे में लिखा है, “वहां मैं करीब दो बजे पहुंचा. उनके शिष्यों ने बताया कि ओशो देह त्याग कर रहे हैं. आप उन्हें बचा लीजिए. लेकिन मुझे उनके पास जाने नहीं दिया गया. कई घंटों तक आश्रम में टहलते रहने के बाद मुझे उनकी मौत की जानकारी दी गई और कहा गया कि डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दें.”

वहीं ओशो की सचिव रहीं नीलम ने भी एक इंटरव्यू में मौत की बात को लेकर संदेह जताया था. उन्होंने बताया था कि ओशो की मां भी आश्रम में रहती थीं, लेकिन उन्हें भी मौत की सूचना देर से दी गई. ओशो की मृत्यु के काफी समय बाद तक उनकी मां यही कहती थीं कि ‘बेटा उन्होंने तुम्हें मार दिया’.

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डॉ. गोकाणी के आने से ठक्कर को मिला बल
ओशो की मौत पर संदेह जताने वाले योगेश ठक्कर को अचानक से परिदृश्य में आए डॉ. गोकाणी के एफिडेविट से काफी समर्थन मिला. अपने हलफनामे में डॉक्टर गोकाणी का कहना है कि, “ओशो की मौत के विवाद को दबाए रखने के लिए मैंने ये बात बाहर नहीं लाई थी. लेकिन पिछले कुछ सालों में अमृतो और जयेश ने जो बयान दिए उनमें विसंगतियां है.  मुझे सिर्फ डेथ सर्टिफिकेट देने के लिए बुलाया गया. 19 जनवरी 1990 के दिन आश्रम में कई डॉक्टर मौजूद थे. फिर भी अमृतो और जयेश ने किसी की मदद लेना या उन्हें अस्पताल ले जाना जरूरी नहीं समझा. सबसे अचरज की बात तो ये है कि ओशो की मौत के पब्लिक अनाउंसमेंट के 60 मिनट बाद ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.”